तलाश न्यूज एजेंसी, लखनऊ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के होम्योपैथी विभाग में दवाओं की खरीद प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। जेम पोर्टल टेंडर की आड़ में नियमों को ताक पर रखकर चुनिंदा कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया, जबकि एमएसएमई उद्यमों को जानबूझकर बाहर रखा गया। एक ही दवा की खरीद अलग-अलग जिलों में तीन गुना तक ऊंची दरों पर की गई, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान हुआ।

होम्योपैथिक ड्रग्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन की शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों से पता चला है कि विभाग ने 2019 के बाद नियमित निविदाएं जारी नहीं कीं। जेम पोर्टल पर होम्योपैथिक दवाओं की अलग कैटेगरी न होने का बहाना बनाकर बीओक्यू (बिल ऑफ क्वांटिटी) आधारित टेंडर जारी किए गए, जिससे पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा पूरी तरह खत्म हो गई। कई टेंडरों में आपूर्तिकर्ताओं के नाम पहले से ही तय दिखे।

कुल 4.49 करोड़ रुपये के बजट में से 2.79 करोड़ केवल 23 जिलों की 662 डिस्पेंसरी को आवंटित कर दिए गए, जबकि बाकी 1.70 करोड़ 922 डिस्पेंसरी में बांटे गए। विभाग द्वारा जारी आवश्यक दवा सूची का अधिकांश जिलों ने पालन नहीं किया और सूची से बाहर की दवाएं खरीदी गईं। कई जगह ब्रांड नाम से निविदाएं जारी की गईं, जो सरकारी नियमों का उल्लंघन है। एक जिले में तो ड्रग लाइसेंस की अनिवार्यता तक नहीं रखी गई।
एक ही दवा, तीन गुना तक अंतर सबसे चौंकाने वाला तथ्य दरों का भारी अंतर है। वन एम डाइल्यूशन दवा की खरीद में प्रतापगढ़ में 198 रुपये, प्रयागराज में 173, बुलंदशहर में 192 और कुशीनगर में 160 रुपये प्रति यूनिट दर दर्ज की गई, जबकि चंदौली में मात्र 34 रुपये। पहले टेंडरों में यह दवा 25-30 रुपये में खरीदी जाती थी और आयुष मिशन द्वारा भी 55-60 रुपये में। विशेषज्ञों का कहना है कि गुणवत्ता समान होने पर इतना अंतर असंभव है।
यह मामला सरकारी खरीद प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है। उद्यमियों ने मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों पर कार्रवाई हो। विभागीय अधिकारी अभी इस पर कोई टिप्पणी करने से बच रहे हैं।

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