April 9, 2026

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सामाजिक विभाजन की प्रवृत्तियों पर जताई चिंता

Concern expressed over social divisions
लखनऊ। सोशल जस्टिस कॉन्क्लेव के दूसरे दिन का आयोजन कैसरबाग स्थित इप्टा कार्यालय में किया गया, जिसमें विभिन्न सत्रों के दौरान देश, समाज और लोकतंत्र से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किए। प्रथम सत्र में युवा : चुनौतियां और उम्मीदें विषय पर छात्र राजनीति और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े वक्ताओं ने युवाओं की भूमिका पर चर्चा की।

आइसा से जुड़े शांतम ने कहा, विवि में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न चरम पर है। एक अन्य सत्र में लेखकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इतिहास की पुनर्व्याख्या, मिथ्या आख्यानों और सामाजिक विभाजन की प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त की। महेंद्र कुमार, राजीव ध्यानी, पत्रकार राघवेंद्र दुबे, वंदना मिश्रा, राजीव निगम और प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा ने अपने विचार व्यक्त किए। राघवेंद्र दुबे ने कहा कि इतिहास के सहारे इंसान अपने अस्तित्व को खोजता है, इससे खिलवाड़ के भयावह परिणाम हो सकते हैं। प्रो. रूपरेखा वर्मा ने कहा कि सामाजिक न्याय की लड़ाई को सड़क पर लाने की जरूरत है।

पूंजी की आंधी में पत्रकारिता का सच विषय पर आयोजित सत्र में मीडिया की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और कॉर्पोरेट प्रभाव जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। पत्रकार शरत प्रधान, जूही सिंह, कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत और सिद्धार्थ कलहंस शामिली रहे। शरत प्रधान ने कहा कि आजकल पत्रकारिता और पत्रकार दोनों एक दबाव हैं।

विशेष व्याख्यान “हिमालय की चिंता पूरे देश की चिंता है” में प्रो. शेखर पाठक ने चेताया कि पर्यावरण की अनदेखी का प्रभाव पूरे देश पर पड़ेगा। “ये देश किसका है? या फिर सबका है?” नामक सत्र में वक्ताओं ने संविधान की भावना और बहुलतावादी समाज की आवश्यकता पर बल दिया। अंतिम सत्र में खुला संवाद हुआ जिसमें आम नागरिकों ने भी अपनी बात रखी।

लेखक सुभाष कुशवाहा ने कहा कि इस देश के मूलवासी आदिवासी हैं। परंतु जब प्रश्न आएगा कि देश किसका होता है, तो ध्यान रखना चाहिए कि जो लोग इस देश को बनाने में कुर्बानी देते हैं, ये देश उनका होता है। लेखक प्रो. नदीम हसनैन और पूर्व शिक्षा मंत्री प्रो. मसूद ने कहा कि सबको साथ लेकर चलने से ही देश आगे बढ़ेगा। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह, पूर्व एमएलसी शशांक यादव, दिनेश कुमार सिंह, सुनील वर्मा आदि मौजूद रहे।