
पूर्वांचल और बिहार के 10 से अधिक जिलों में महिलाओं और बच्चों में साइकोजेनिक सिंड्रोम का खतरा बढ़ता जा रहा है। चिकित्सकीय भाषा में इसे पीएनईएस (साइकोजेनिक नॉन-एपिलेप्टिक सिंड्रोम) कहा जाता है। बीएचयू अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग की ओपीडी में हर महीने इस समस्या से ग्रसित करीब 200 मरीज परिजनों के साथ पहुंच रहे हैं। इनमें 8 वर्ष के बच्चों से लेकर 35 वर्ष तक की महिलाएं शामिल हैं।
मार्च में जुटेंगे देश भर के विशेषज्ञ
यूपी और बिहार में पीएनईएस के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसके कारण, बचाव और उपचार की नई रणनीति तैयार की जा रही है। आगामी 7-8 मार्च को केरल, दिल्ली, यूपी, बिहार, महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न संस्थानों से मनोचिकित्सक, न्यूरोलॉजिस्ट और मनोवैज्ञानिक आईएमएस-बीएचयू में जुटेंगे। इसमें बीमारी के कारण, पहचान और उपचार की तकनीकों पर चर्चा होगी। विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों में बढ़ते मामलों पर मंथन किया जाएगा।
साइकोजेनिक सिंड्रोम में दिखते हैं ये लक्षण
- मिर्गी के मरीजों की तरह शरीर में कंपन या ऐंठन
- कुछ समय के लिए बेहोशी जैसा महसूस होना
- सामान्य स्थिति में हाथ-पैर पटकना
- देखने में मरीज बेहोश लगे, लेकिन पूरी तरह अचेत न हो
थेरेपी और काउंसिलिंग से मिलती है राहत
केस-1
जौनपुर निवासी 24 वर्षीय युवती को शादी के डेढ़ महीने बाद मिर्गी जैसा झटका आने लगा। परिजनों ने पहले इसे मिर्गी मानकर उपचार कराया, लेकिन जब राहत नहीं मिली तो वे बीएचयू के न्यूरोलॉजी ओपीडी पहुंचे। जांच में पता चला कि यह पीएनईएस (साइकोजेनिक नॉन-एपिलेप्टिक सिंड्रोम) के लक्षण हैं। युवती ने बताया कि परिवार में कलह के कारण उसे मानसिक आघात पहुंचा था। डॉक्टरों ने उसे बिहेवियर थेरेपी कराने की सलाह दी।
केस-2
बिहार के बक्सर निवासी 28 वर्षीय महिला को बार-बार हाथ-पैर में झनझनाहट के साथ झटके जैसा महसूस होता था। परिजनों के अनुसार यह समस्या रह-रहकर होती थी। बीएचयू अस्पताल में काउंसिलिंग के दौरान महिला पहले जवाब देने में हिचकिचाई, बाद में बताया कि बचपन में उसे एक बार सिर में चोट लगी थी। अब जब भी झटका आता है तो परिवार के लोग घबरा जाते हैं। फिलहाल उसकी काउंसिलिंग और थेरेपी कराई जा रही है।

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