March 9, 2026

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कानपुर की इन ‘वंडर वुमन’ ने बदली समाज की सोच, तकनीक से लेकर सेना तक बुलंद की पहचान

These Wonder Women from Kanpur have changed society thinking raising their profile from technology to military

ये पंक्तियां महिला सशक्तिकरण, साहस और आधुनिक पहचान को दर्शाती हैं। यह बताती हैं कि महिला केवल घर तक सीमित नहीं, बल्कि समाज में शक्ति, प्रेरणा, बदलाव और मार्गदर्शक की वाहक है। कुछ इसी तरह आगे बढ़ते हुए डिजिटल सहायक हो या रास्ता दिखाने वाला नेविगेशन, रेलवे स्टेशन पर अगली ट्रेन की घोषणा हो या मेट्रो में आने वाले स्टेशन की जानकारी… हर जगह महिलाओं की आवाज ने अपनी पहचान बना ली है। इसके अलावा कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने कानपुर की बोली को दुनिया भर में फैलाया है।

स्मार्ट स्पीकर और मोबाइल फोन में मौजूद वर्चुअल असिस्टेंट जैसे अलेक्सा, सिरी से लेकर रेलवे स्टेशनों, मेट्रो और कस्टमर-केयर की रिकॉर्डेड कॉल तक, अनेक जगहों पर महिला स्वर ही लोगों का मार्गदर्शन करता है। महिला आवाज को अधिक स्पष्ट, संतुलित और भरोसेमंद माना जाता है, इसलिए कई तकनीकी सेवाओं और सार्वजनिक घोषणाओं में इसे प्राथमिकता दी जाती है। यह केवल तकनीक की पसंद नहीं, बल्कि इस बात का भी संकेत है कि महिलाओं की उपस्थिति और प्रभाव आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र में महसूस किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर  आपको उन महिलाओं से रूबरू करवाने जा रहा है, जिनकी आवाज आपने अक्सर सुनी होगी, लेकिन चेहरा शायद ही देखा हो।

शताब्दी ट्रेन में गूंज रही आरजे श्रेया की आवाज
नमस्कार कानपुर-दिल्ली शताब्दी ट्रेन में आपका स्वागत है… सुबह छह बजे सेंट्रल स्टेशन से दिल्ली के लिए रवाना होने वाली शताब्दी ट्रेन में आपने यह आवाज जरूर सुनी होगी। यह आवाज किसी और की नहीं, बल्कि रेडियो मिर्ची की आरजे श्रेया की है। ट्रेन की लॉन्चिंग के दौरान श्रेया को अनाउंसमेंट के लिए चयनित किया गया था। उस समय उनका शो पुरानी जींस एफएम पर काफी लोकप्रिय था, जिसे सुनकर रेलवे अधिकारियों ने उन्हें बुलाया और उनकी आवाज रिकॉर्ड की। करीब 16 वर्षों से श्रेया की आवाज कानपुर से दिल्ली तक यात्रियों का मार्गदर्शन कर रही है। श्रेया कहती हैं कि कई श्रोता उनकी आवाज को पहचान कर उन्हें सोशल मीडिया पर टैग करते हैं। यह उनके लिए गर्व का अनुभव है और उनके पिता भी इस उपलब्धि पर बेहद खुश हैं। जब रिकॉर्डिंग की गई थी, उस समय इटावा स्टॉपेज शामिल नहीं था। बाद में इसे जोड़ा गया। केवल इटावा शब्द उनका नहीं है, पिछले 16 वर्षों में बाकी रिकॉर्डिंग में बिल्कुल बदलाव नहीं हुआ है। वर्तमान में श्रेया क्रिएटिव हेड के पद पर कार्यरत हैं।

 से ज्यादा किरदारों की आवाज निकालती हैं नेहा
टीवी शो में सुनाई देने वाली चिड़िया, कुत्ते, बिल्ली और कार्टून कैरेक्टर जैसे डोरेमोन, शिन-चैन की आवाज निकालने वाली नेहा शर्मा ने अपनी अलग पहचान बनाई है। किदवईनगर की रहने वाली नेहा 100 से ज्यादा एक्टर्स और जानवरों की आवाज निकाल लेती हैं। नेहा कहती हैं कि वह शुरू में सिंगर बनना चाहती थीं और इसके लिए इंडियन आइडल शो में भी गई थीं, लेकिन तब अनु मलिक को उनकी कॉमेडी पसंद आई और उन्होंने उन्हें इसी राह को अपनाने की सलाह दी। इसके बाद नेहा कई टीवी शो, कॉमेडी सीरियल और फिल्मों में डबिंग कर चुकी हैं। हाल ही में वह एक वेब सीरीज की शूटिंग भी कर रही हैं।

कानपुर की बोली को दुनिया में पहचान दिला रहीं नयनी
हां हम कानपुर से हैं, हमारे यहां थप्पड़ नहीं, कंटाप होता है… कुछ ऐसी बोली-भाषा से कानपुर को देश-विदेश में पहचान दिलाने का प्रयास कर रहीं नयनी दीक्षित ने अपनी आवाज और अंदाज से लोगों के मन पर खास छाप छोड़ी है। भले ही उन्हें मेरी शादी में जरूर आना फिल्म से प्रसिद्धि मिली, लेकिन नयनी काफी समय से बॉलीवुड में सक्रिय रही हैं। उन्होंने अपने फिल्मी कॅरिअर की शुरुआत स्पेशल 26 फिल्म से की और इसके बाद कई टीवी शो और फिल्मों की डबिंग भी की। एफटीआईआई से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद नयनी पिछले 16 वर्षों से एक्टिंग की ट्रेनिंग दे रही हैं। स्टैंडअप कॉमेडी में उभरती नयनी सोशल मीडिया के जरिये अपने शहर कानपुर की खूबियों को भी लोगों तक पहुंचा रही हैं। उनका भविष्य का इरादा एक्टिंग स्कूल खोलने का है।

सेना में लेफ्टिनेंट बनीं आद्या
लखनपुर स्थित कृष्णा हैबिटेट सोसाइटी में रहने वाली आद्या पांडेय ने शनिवार को गया स्थित अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए) में आयोजित पासिंग आउट परेड में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन प्राप्त किया। उनकी पहली तैनाती सिग्नलिंग कोर पालमपुर में हुई है। वह बिल्हौर तहसील से भारतीय सेना में शामिल होने वाली पहली महिला अधिकारी होंगी। वह लड़ाकू विमान की पायलट बनना चाहती थीं। अब उन्होंने सेना में लेफ्टिनेंट बनकर परिवार और क्षेत्र का नाम रोशन किया है। आद्या के पिता आदित्य कुमार पांडेय का पाॅवर और सोलर का कारोबार है। आद्या की मां शालिनी पांडेय एसएन सेन बालिका इंटर कॉलेज में शिक्षिका हैं।

अपने हौसले के दम पर बाबूपुरवा से बुर्ज खलीफा तक पहुंचीं शाजिया
बाबूपुरवा निवासी डॉ. शाजिया तशनेम सिद्दीकी ने अपने हौसले और मेहनत से बुर्ज खलीफा तक अपनी पहचान बनाई है। उनके ग्रुप डॉ. शाजिया इंटरनेशनल का वहां दफ्तर है। यह संयुक्त राष्ट्र संगठन और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर वैश्विक शांति और सामाजिक कल्याण पर काम कर रहा है। शाजिया बताती हैं कि उनके पिता मो. वसीम सिद्दीकी का बाबूपुरवा में छोटा होटल था। घर में तीन बहने और दो भाई भी थे। हालात बिगड़े तो पढ़ाई रुक गई। बाद में मदरसा और हलीम कॉलेज में दाखिला लेने के बाद भी संसाधनों की कमी और सामाजिक विरोध उनके रास्ते में बाधा बने। साल 2013 में सरकार से लैपटॉप मिलने के बाद उन्होंने इसी से प्लेसमेंट एजेंसी ज्वाइन कर ली। धीरे-धीरे पढ़ाई और काम को आगे बढ़ाया। शाजिया ने बताया कि जीके प्रतियोगिता में मोबाइल जीता था। इसके बटन खराब होने के बावजूद उन्होंने कठिनाइयों को पार किया। पिता के हौसले और खुद की जिद ने उन्हें आगे बढ़ाया। बाद में दुबई से मिले ऑफर में उन्होंने मेटा और एनएसपी क्लब जैसे प्लेटफॉर्म पर काम शुरू किया और बुर्ज खलीफा में उनका ऑफिस स्थापित हुआ। इसके अलावा उनके नाम से जालन महाराष्ट्र में मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का निर्माण भी चल रहा है।