
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में लगभग 20 वर्षों के बाद सफल बहु अंगदान की प्रक्रिया पूरी की गई। सड़क हादसे के बाद ब्रेड डेड का शिकार हुए 42 वर्षीय संदीप भले ही अब दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके अंग अलग-अलग लोगों के शरीर में जिंदा रहेंगे। उनके अंगों ने पांच लोगों को नई जिंदगी और रोशनी दी है। संदीप के इस योगदान के लिए रविवार को अंगदान प्रक्रिया होने के बाद उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।
लखनऊ के रहने वाले संदीप कुमार 7 फरवरी को सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। विभिन्न अस्पतालों में इलाज के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। 21 फरवरी की रात उन्हें पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। 22 फरवरी को चार वरिष्ठ विशेषज्ञ चिकित्सकों के पैनल ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया। डॉक्टरों ने उनकी पत्नी व परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित किया। उनकी पत्नी ने अंगदान की सहमति दी। इसके बाद स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (सोटो-यूपी) के संयुक्त निदेशक एवं चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्षवर्धन के मार्गदर्शन में अंग प्राप्ति की प्रक्रिया शुरू की गई। पीजीआई और केजीएमयू के विशेषज्ञों की टीमों ने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया।
संदीप का लिवर ग्रीन काॅरिडोर बनाकर समय रहते केजीएमयू पहुंचाया गया जहां प्रतीक्षा सूची में पंजीकृत मरीज में उसे सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया।
दोनों किडनी 35 से 40 वर्ष आयु वर्ग की दो महिलाओं को लगाई गईं, जो पिछले कई वर्षों से डायलिसिस पर थीं।
कॉर्निया निकालने की प्रक्रिया भी सफलतापूर्वक पूरी की गई। दोनों कॉर्निया को केजीएमयू के सामुदायिक नेत्र बैंक को सौंपा गया, जिसे प्रतीक्षा सूची के दो नेत्रहीन मरीजों लगाया जाएगा।
दोनों किडनी 35 से 40 वर्ष आयु वर्ग की दो महिलाओं को लगाई गईं, जो पिछले कई वर्षों से डायलिसिस पर थीं।
कॉर्निया निकालने की प्रक्रिया भी सफलतापूर्वक पूरी की गई। दोनों कॉर्निया को केजीएमयू के सामुदायिक नेत्र बैंक को सौंपा गया, जिसे प्रतीक्षा सूची के दो नेत्रहीन मरीजों लगाया जाएगा।
परिवार को फैसला ऐतिहासिक और प्रेरक : प्रो. धीमन
संस्थान के निदेशक डॉ. आरके धीमन ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि एपेक्स ट्रॉमा सेंटर की नीति के तहत ब्रेन डेथ के मामलों में यदि परिजन अंगदान की सहमति देते हैं तो सहमति के समय से संपूर्ण उपचार का खर्च माफ किया जाता है। दिवंगत अपने पीछे पत्नी और आठ वर्षीय पुत्र को छोड़ गए हैं। परिवार के इस ऐतिहासिक फैसले ने पांच लोगों को नया जीवन दिया, बल्कि समाज को अंगदान के प्रति जागरूक करने का प्रेरक संदेश भी दिया है।
एपेक्स ट्रॉमा से केजीएमयू 18 मिनट में पहुंची एंबुलेंस
एपेक्स ट्रॉमा से केजीएमयू के लिए अंग ले जाने के लिए ग्रीन कॉरीडोर बनाया गया। एडीसीपी ट्रैफिक राघवेंद्र सिंह के नेतृत्व में ट्रैफिक पुलिस ने रूट को पूरी तरह से खाली करा लिया, जिससे एंबुलेंस मात्र 18 मिनट में ट्रॉमा से केजीएमयू पहुंची।

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