January 12, 2026

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किसान दिवस विशेष: विदेशी नौकरी और लाखों का पैकेज ठुकराकर गांव लौटे युवा इंजीनियर, आधुनिक खेती से उगा रहे ‘सोना’

कानपुर (भीतरगांव), 23 दिसंबर 2025:

किसान दिवस पर उन युवाओं को सलाम, जो शहर की चकाचौंध और विदेशी ऑफर छोड़कर गांव की मिट्टी से जुड़ गए। भीतरगांव ब्लॉक के पतारी, चतुरीपुर और ककरहिया गांव के शिक्षित युवा आधुनिक तकनीक अपनाकर खेती को लाभकारी व्यवसाय बना रहे हैं। ये न केवल अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं, बल्कि अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन गए हैं।

14 लाख का पैकेज ठुकराया, इजरायली तकनीक से तीन गुना फसल

पतारी गांव के अभिषेक सचान ने अलीगढ़ से बीटेक किया और निजी कंपनी में इंजीनियर बने। कंपनी ने 14 लाख सालाना पैकेज के साथ विदेश भेजने का ऑफर दिया, लेकिन अभिषेक ने इसे ठुकराकर गांव लौटना चुना। उन्होंने इजरायल से बाजरा का उन्नत बीज मंगवाया, जिससे सामान्य की तुलना में तीन गुना अधिक उपज मिली। भुट्टा चार फीट से लंबा हुआ। अब वे गेहूं और चने की खेती में नई तकनीक आजमा रहे हैं। ड्रिप सिंचाई और कम बीज (प्रति बीघा मात्र 15 किलो) से खेत हरा-भरा हो गया है। अभिषेक कहते हैं, “खेती में अपार संभावनाएं हैं, बस आधुनिक तरीके अपनाने की जरूरत है।”

भूटान से प्रेरणा लेकर लगाया ड्रैगन फ्रूट का बाग

ककरहिया गांव के संजीव कुमार यादव भारत सरकार के उपक्रम से कार्यपालक निदेशक रह चुके हैं। भूटान में 1200 मेगावाट जल विद्युत परियोजना के मैनेजिंग डायरेक्टर रहते हुए ड्रैगन फ्रूट की खेती से प्रेरित हुए। फरवरी में रिटायरमेंट के बाद जुलाई में तीन बीघा जमीन पर ड्रैगन फ्रूट का बाग लगाया। संजीव का कहना है, “मेरा मकसद इच्छुक किसानों को मार्गदर्शन देकर उनकी आय बढ़ाना है।” यह फसल कम पानी और मेहनत में अधिक मुनाफा देती है।

बेंगलुरु की नौकरी छोड़ अपनाई रसायन-मुक्त खेती

चतुरीपुर गांव के इंजीनियर दंपति अंकुर सचान (सॉफ्टवेयर इंजीनियर) और रश्मि सचान (मैकेनिकल इंजीनियर) ने 2022 में बेंगलुरु की नौकरी छोड़ पैतृक गांव लौटकर प्राकृतिक खेती शुरू की। कोरोना काल में गांव आए और रसायन-मुक्त तरीके अपनाए। सह-फसली विधि से एक साथ हल्दी, अमरूद, पपीता, पालक, मेथी, टमाटर, बैंगन जैसी फसलें उगा रहे हैं। रश्मि कहती हैं, “प्राकृतिक खेती से मिट्टी स्वस्थ रहती है और फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है।”

ये युवा साबित कर रहे हैं कि खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक और मेहनत से ‘सोना’ उगाने का माध्यम है। किसान दिवस पर इनकी कहानी अन्य युवाओं को गांव की ओर लौटने की प्रेरणा दे रही है।